प्रसाद कृत”कामायनी”का श्रद्धा सर्ग

छायावाद युग एवं प्रसाद वांग्मय कीसर्वोत्कृष्ट रचना कामायनी का श्रद्धा सर्ग जीवनदर्शन तथा विचार वैभव की दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखता है।

श्रद्धा कामायनी का ही दूसरा नाम हैजिसे आलोच्य महाकाव्य की नायिका,मनु की प्रेरणा,जीवन का श्रद्धा तत्व आदि रूपों में देखा गया है।महाप्रलय की गहन घटा में चिन्तालीन एवं निराश बैठे मनु के समक्ष श्रद्धा का आगमन उनके मन प्राणों में अमृत रस का संचार कर देता है।श्रद्धा निराश मनु की कोमल कल्पना एवं उनकी उदात्त आकांक्षाओं की सजीव प्रतिमूर्ति के रूप में आती है जो मनु के मन को सुदृढता प्रदान करती है।भारतीय दर्शन शक्तिहीन शिव को भी शव तुल्य मानता है।महाकवि कालिदास ने “रघुवंश”के आरम्भ में पार्वती और परमेश्वर के ऐक्य रूप की वंदना सम्भवतः इसी लिए की है।

रीतिकालीन कवियों के तरह प्रसाद जी ने नारी को रमणी और कामिनी के रूप में नही देखा है बल्कि उन्होनें नारी को पुरुषों की प्रेरणाशक्ति के रूप में देखा है।श्रद्धा मनु से कहती है-

कहा आगन्तुक ने सस्नेह अरे,तुम इतने हुए अ धीर।

हार बैठे जीवन का दांव, जीतते मरकर जिसको वीर।।

तप नही केवल जीवन सत्य, करून यह क्षणिक दिन अवसाद।

तरल आकांक्षा से है भरा,सो रहा आशा का आह्लाद।।

इसप्रकार श्रद्धा मनु के जीवन में आशा संचार करती है तथा स्नेह और सहानुभूति से भरकर जीवन के अभियान में निरंतर साथ देने का संकल्प लेकर प्रस्तुत होती है।

श्रद्धा के माध्यम से कवि की नारी भावना का भी पूर्ण परिचय मिलता है।कवि के अनुसार नारी भोग्या नहीं अपितु वह प्रेरणाशक्ति है जो जड़ में चेतना का संचार करती है,अपूर्ण को पूर्ण बनाती है।जीवन को स्थिरता प्रदान करती है तथा नयी पीढ़ी का आह्वान करती है।नारी का स्वरूप स्नेहिल एवं ममतामयी है।उन्होंने स्वयं भी कहा है -“नारी तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास रजत नग पगतल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।।”

इसप्रकार कामायनी के माध्यम से कवि नारी की महत्ता को प्रतिष्ठित करते हुए मानव मन को परम् सत्य से जोड़ा है।कामायनी का श्रद्धा सर्ग अपने आप में सम्पूर्ण कला वैभव से परिपूर्ण है।

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