दिनकर और काव्य

हिंदी साहित्य में राष्ट्रकवि दिनकर का पदार्पण सन 1935 ई में उनके सुप्रसिद्ध काव्यग्रन्थ रेणुका के प्रकाशन के साथ हुआ।छायावाद के श्रेष्ठ कवि जयशंकर प्रसाद कृत कामायनी जैसी रचना भी उस समय तक प्रकाश में आ चुकी थी। काव्यभाषा के रूप में हिंदी की स्थापना के साथ ही उसका मानक रूप भी सुनिश्चित हो चुका था। छायावादी कवियों ने हिन्दीभाषा में अर्थ गाम्भीर्य और अभिव्यंजना शक्ति भी ला दी थी,दिनकर तथा निराला जैसे कवियों ने ओज औऱ पौरूष जैसे तत्व का भी सृजन कर दिया था।दिनकर जी की हुंकार में ओज का प्राधान्य है तो रश्मिरथी औऱ कुरुक्षेत्र जैसे ग्रन्थों में पौरुष का स्वर बुलंद हुआ है

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दिनकर कृत उर्वशी आधुनिक हिंदी साहित्य की एक प्रख्यात रचना है ।यह रचना कवि की सुक्ष्म दर्शिता औऱ उनकी प्रगतिशील मनोवृति का परिचायक है।उर्वशी एक काव्य नाटक है जिसके पात्र के रूप में प्रतिष्ठान पुर के राजा पुरुरवा तथा स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी,रंभा,मेनका,चित्रलेखा आदि है उर्वशी में पात्रों की अवधारणा एक अदभुत अलौकिक वातावरण का निर्माण करती है। भाषा के सम्बंध में दिनकर की धारणा है कि कविता का अंतिम विश्लेषण उसकी भाषा की विश्लेषण है।दिनकर ने अपनी रचनाओं में अमिधा, लक्षणा औऱ व्यंजना आदि शब्दशक्ति का प्रयोग किया है।

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