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ज़िन्दगी में एक समय ऐसा आता है कि आपका जीवन हमेशा के लिए बदल जाता है। सन 2013 ऐसा ही एक साल था। लगातार घर में रहने का सिलसिला स्कूलिंग तक तो चला लेकिन 2013 में जब एक बार घर से बहार आये तब से बंजारे बने घूम रहे हैं। यह साल कई मायनों में महत्त्वपूर्ण था। पहली बार घर से दूर जाकर नए माहौल में रहना सीखा , पहली बार एडजस्ट करना सीखा , खुद को मैनेज करना सीखा , ढंग से गाली देना भी इसी साल में आकर सीखा 😉

अब मैं खुद का मालिक खुद ही था , मुझ पर घर की बंदिशें नहीं रहीं , कोई सुबह जल्दी उठने को नहीं कहता था , कोई पढ़ने को नहीं कहता था , बाहर घूमने पर पाबन्दी नहीं थी। इन सबके बीच कुछ ऐसा था जिससे लगा कि मैं बदल रहा हूँ , कुछ था जो मुझे बेकार घूमने से रोकता था , जो मुझे पढ़ने को कहता था , जिससे कभी कभी घर की फ़िक्र हो जाती थी। इन सबके बीच मैंने दाख़िला लिया विश्वविद्यालय महाराजा महाविद्यालय  में।
ऐसे तो समूचे राजस्थान में महाराजा कॉलेज एक बड़ा नाम है लेकिन उन दिनों हमारे कॉलेज की हालत भी किसी आम सरकारी कॉलेज जैसी ही थी। ऐसे कॉलेज में अमूमन सबकुछ समान सा ही रहता है वही खाली कक्षाएं , वही मेरे जैसे लापरवाह स्टूडेंट्स , कुछ छात्रनेता , कुछ बहुत पढ़ने वाले , लड़कियों के लिए तरसती आँखें , किसी फीमेल की आवाज सुनने को आतुर कान ( क्योंकि कॉलेज केवल लड़कों का था )आदि। पहली बार सुनने पर कॉलेज साधारण सा लगता है लेकिन कुछ बातें हैं जो इस कॉलेज को ख़ास बनती हैं। सबसे बड़ी बात हमारे कॉलेज का स्वर्णिम इतिहास , राजस्थान का सबसे पुराना कॉलेज होने का रुतबा , कॉलेज की अनूठी बिल्डिंग जिसके पंखे हमें आज भी याद हैं , लड़कियां तो दूर अगर हमसे क्लास में मैडम भी नाम लेकर बात कर लेती तो मेरे जैसे कुछ स्टूडेंट्स अपने आप पर इतराने लगते , कॉलेज के बिल्कुल सामनेमहारानी कॉलेज  था ( जो केवल लड़कियों का कॉलेज था ) और इसी वजह से हमारी हाज़िरी क्लासों में कम और कॉलेज के बस स्टैंड पर ज्यादा लगती थी और सबसे ख़ास बात जो मैंने सबसे पहले हमारी वाईस प्रिंसिपल के मुंह से सुनी कि
     WE ARE MAHARAJA’S


विश्वविद्यालय महाराजा कॉलेज ,  जयपुर में सवाई रामसिंह रोड पर है।  महाराजा और महारानी कॉलेज आमने सामने ही बने हैं। राजस्थान का व्यक्ति चाहे कॉलेज गया हो या नहीं गया हो लेकिन अगर उसने महाराजा कॉलेज का नाम सुना  होगा तो उसे महारानी कॉलेज के बारे में जरूर मालूम होगा। हर किसी को लगता है कि जिसने महाराजा कॉलेज में एडमिशन लिया है उसकी गर्ल फ्रेंड पक्का बनेगी। आप महाराजा में एडमिशन के बाद पहली बार घर आओ तो आपके साथी आपकी पढ़ाई का नहीं पूछते , उनका पहला सवाल होता है लड़की पटाई या नहीं ? अगर आप ना कर दो तो अगला सवाल – क्यों झूठ  बोलता है , तुम्हारे सामने ही तो महारानी कॉलेज है , गर्लफ्रेंड तो बननी ही बननी है। ऐसा वाकया सभी महाराजा वालों के साथ होता है।

किसी को अपने कॉलेज की महिमा उसके रिजल्ट से पता चलती है , किसी को उसकी रैंकिंग से।  मुझे मेरे कॉलेज की महत्ता का पता चला मिनी कंडक्टर से। जयपुर में मिनी बस वाले आमतौर पर अपनी मर्जी से किराया लेते हैं या राजस्थानी में कहें – “माथो देखगे टीको काडे।” उनकी ये मर्जी 5 रूपये से 20 रूपये तक चलती है। मैंने भी कई बार 10 – 10 रूपये में सफर किया था।  उस दिन मैंने कंडक्टर को 10 का नोट देते हुए महाराजा बोला तो उसने कहा- “आप थोड़ा रुकिए सर ! मैं अभी आपको 5 रूपये वापिस देता हूँ। ” मुझे लगा यार महाराजा का बड़ा नाम है।  आज ये बात बड़ी हास्यास्पद लगती है कि जिस कॉलेज का पुरे क्षेत्र में सिक्का चला  उसका महत्त्व मुझे 5 रूपये के सिक्के से चला।  बस से उतरकर क्लास तक का सफ़र मेरे लिए घबराहट भरा रहा।  कई पुराने कॉलेज स्टूडेंट्स से और कई फिल्मो से मुझे रैगिंग के बारे में पता था। ये भी मालूम था कि महाराजा में भी कई बार रैगिंग होती है तो  मैं डर के मारे धीमे धीमे चल रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो मुझे किसी गहरे जंगल में छोड़ दिया गया है और चारों और हिंसक जानवर हैं जो कभी भी हमला कर सकते हैं। सच कहूं तो आज मुझे ये रैगिंग लेने वाले खूंखार जानवर ही लगते हैं जो इंट्रोडक्शन के नाम पर नए स्टूडेंट्स से मारपीट करते रहते हैं।

ख़ैर , मैं जैसे तैसे आगे बढ़ता गया तो पहली बार कॉलेज प्रांगण में जनरल सेक्शन के सामने खड़ा हो गया। उस दिन पहली बार मुझे भीड़ में अकेले का अहसास हुआ। चारों तरफ स्टूडेंट्स घूम रहे थे और मेरी हालत ऐसी हो गयी थी कि मैं जिस भी स्टूडेंट को मेरी तरफ आते देखता तो मुझे लगता कि ये मेरी रैगिंग लेने आ रहा है। हालांकि कॉलेज में शुरूआती दिनों में छात्रसंघ के चुनाव के कारण कई छात्रनेता कॉलेज में घूमते रहते हैं लेकिन मेरा पहला दिन था इसलिए मैंने किसी से मिलने की हिम्मत नहीं की। मैंने टाईमटेबल देखा और क्लास में जाने लगा। महाराजा नाम और पुराने अंदाज में बनी ईमारत , सच में एक शाही अहसास करा रहे थे और मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। भय के साथ गौरव का भाव मैंने जीवन में पहली बार महसूस किया।

……………………………………… to be continued



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